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Man held after wife forced to carry him on shoulders over 'infidelity'
The police action came after a video of the incident went viral on Wednesday, in which the woman is seen carrying her husband on her shoulders as a punishment while villagers, carrying sticks, can be seen heckling her.
July 30, 2020 at 05:18PM
New National Education Policy: Youngsters elated, but worry about Boards
Students react to the new features introduced in National Education Policy 2020, which has been given a nod by the Union Cabinet.
July 30, 2020 at 04:43PM
देश में सबसे कम टेस्ट यहीं हो रहे हैं; सीएम ने रोज 20 हजार टेस्ट करने का आदेश दिया, लेकिन व्यवस्था बस 10 हजार की हो पा रही है

22 मार्च, 1912 इतिहास की वो महत्वपूर्ण तारीख़ है जिस दिन बिहार का बतौर राज्य जन्म हुआ। बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग होकर एक राज्य बनने से एक साल पहले यानी 1911 से 1920 के बीच इस राज्य में करीब चार लाख लोग प्लेग नामक बीमारी से मारे गए। वहीं, 1909-10 में बिहार के लगभग सभी जिले मलेरिया की चपेट में आ गए थे। मुजफ्फरपुर में हैजा से लोग मर रहे थे। पटना, शाहाबाद, सारण, हाजीपुर और मुंगेर में प्लेग महामारी बन चुका था।

सारण में लगभग बीस हजार और मुंगेर में लगभग साढ़े चार हजार लोगों की मौत हुई लेकिन सबसे बुरा हुआ 1918 में। इस साल पूरी दुनिया में एक स्पैनिश फ़्लू फैला। तब पहले से ही हजार मुश्किलों से जूझ रहा बिहार भी इसकी चपेट में आया और छ महीने से भी कम समय में 6 लाख लोग मारे गए। आज एक बार फिर पूरी दुनिया एक अनजान वायरस और बीमारी से जूझ रही है। एक बार फिर बिहार इस वायरस की चपेट में हैं और दिन पर दिन बड़ी त्रासदी की तरफ बढ़ रहा है।

देशभर के मुक़ाबले बिहार में सबसे कम टेस्ट हो रहे हैं। सरकार ने 20 हजार रोजाना टेस्ट करने का आदेश दिया है, लेकिन टारगेट पूरा नहीं हो पा रहा है।

बिहार में कोरोना का पहला मामला 22 मार्च को सामने आया था और 25 जुलाई को एक दिन में सबसे ज्यादा 2803 नए कोरोना संक्रमित मरीज मिले हैं। अभी राज्य में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर 45919 हो गई है। वहीं, राज्य में 14 कोरोना संक्रमित मरीजों की इलाज के दौरान मौत हो चुकी हैं। ये स्थिति तब है जब राज्य में देशभर के मुक़ाबले सबसे कम टेस्ट हो रहे हैं।

ख़बर है कि मुख्यमंत्री द्वारा हर रोज बीस हज़ार टेस्ट करने का आदेश देने के बाद भी बिहार की व्यवस्था बहुत ज़ोर लगाने के बाद दस हजार टेस्ट रोज कर पा रही है। इस वजह से अभी भी साफ-साफ पता नहीं चल पा रहा है कि राज्य में कोरोना के कुल कितने मरीज हैं और संकट वाक़ई कितना बड़ा है?

अब एक नजर डाल लीजिए राज्य में उपलब्ध सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर जो पिछले कई सालों से ख़ुद ‘आईसीयू’ में भर्ती है। सबसे बड़ी विडम्बना भी यही है कि इसी बीमार व्यवस्था के सहारे बिहार कोरोना जैसे अनजान और ख़तरनाक वायरस से मुकाबला कर रहा है।

तस्वीर पटना की है, जहां एक हेल्थ कर्मी कोरोना की जांच के लिए सैंपल ले रहा है।

क्या कहते हैं आँकड़े?

बिहार में परमानेंट डॉक्टर के कुल 6261 पद हैं मगर फ़िलहाल सिर्फ 3821 डॉक्टर बहाल हैं और 2440 पद खाली हैं. बिहार में ठेके पर रखे जाने वाले डॉक्टर के कुल 2314 पद हैं मगर फ़िलहाल महज 531 डॉक्टर बहाल हैं. दोनों के कुल 8575 पदों में 50 प्रतिशत पद खाली हैं. बिहार की हर एक लाख जनसंख्या पर मात्र 4 डॉक्टर और 2 नर्स हैं जो देश में सबसे कम है।

बिहार में स्थाई और ठेके पर रखे जाने वाले नर्सों के कुल मिलाकर 5331 पद हैं जिसमें मात्र 2302 नर्स बहाल हैं और बाकी 3029 पद खाली हैं. लगभग 57 प्रतिशत की वैकेंसी है। ये हालत पिछले 15 सालों से है। 12.5 करोड़ की आबादी वाले बिहार में आज सिर्फ 4352 सरकारी डॉक्टर हैं और यही वजह है कि बिहार में हर साल चमकी बुखार, लू लगने और ठनक गिरने (आकाशीय बिजली) की वजह से ही सौ-दो सौ लोगों की मौत हो जाती है।

अब क्या किया जा सकता है?इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने जॉर्ज इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ के साथ बतौर सीनियर रिसर्च फेलो जुड़े और बिहार से वास्ता रखने वाले डॉक्टर विकास केसरी से सम्पर्क किया। बकौल डॉक्टर विकास आज की तारीख में बिहार के पास बहुत सीमित रास्ते हैं।

तस्वीर एनएमसीएच पटना की है, जहां कोरोना संक्रमित मरीज को इमरजेंसी वार्ड में स्वास्थ्यकर्मी ले जाते हुए।

वो कहते हैं,“साफ दिख रहा है कि जब देश के कई राज्यों में जब कोरोना के मामले कम होंगे, तब बिहार में इस वायरस का प्रकोप चरम पर रहेगा। बिहार पर हर तरफ से संकट है। आर्थिक स्थिति ख़राब है। साक्षरता और जागरूकता का स्तर भी कम है। बाढ़ का संकट अलग है। ये सब मिलकर आने वाले दिन में बिहार के लिए बड़ा संकट पैदा करने वाले हैं।”

डॉक्टर विकास केसरी अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “बिहार सरकार को मदद मांगनी होगी। जल्दी से जल्दी। वहीं केंद्र सरकार को बिहार में कुछ रेडिकल करना होगा। जैसे, देशभर से एक्सपर्ट वहां भेजे जाएं। राज्य के पांच बड़े अस्पतालों में जल्दी से जल्दी कम से कम दो-तीन सौ फुल ऑक्सीजन वाले बेड तैयार किए जाएं। इसके बाद राज्य का पूरा का पूरा हेल्थ सिस्टम विशेषज्ञ डॉक्टरों के हवाले किया जाए."

डॉक्टर विकास केसरी इस बातचीत में इतना तक कहते हैं कि अगर वक्त रहते हुए ये सब नहीं किया गया तो आने वाले दिन बिहार के लिए बहुत मुश्किल होने वाले हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन बातों की तरफ अकेले डॉक्टर विकास केसरी जैसे विशेषज्ञ इशारा कर रहे हैं।

19 जुलाई को बिहार में बढ़ते कोरोना के मामलों की खोज-ख़बर लेने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक विशेष टीम पहुंची थी। इस टीम ने जो सुझाव दिए हैं, उसमें कहा गया है कि राज्य सरकार को टेस्टिंग का तरीक़ा बदलना होगा। टीम ने कहा कि ट्रैकिंग, टेस्टिंग और ट्रीटमेंट पर जोर दिया जाना चाहिए। टीम ने 19 जुलाई को वही कहा जो कोरोना फैलने के पहले दिन से कहा जा रहा है।

बिहार में कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं, बुधवार तक राज्य में संक्रमितों की संख्या बढ़कर 45,919 हो गई है।

इतना ही नहीं, इसी बीच बिहार सरकार ने 27 जुलाई को स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को दूसरी बार बदल दिया। सरकार ने कोरोना संकट के बीच, वरिष्ठ आईएएस (IAS) अधिकारी प्रत्यय अमृत को स्वास्थ्य विभाग में प्रधान सचिव की जिम्मेदारी सौंप दी।

आने वाले दिनों में होने वाली मुश्किलों का अंदाज़ा अभी से हो रहा है। पहले से बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था और चरमरा गई है। मुख्यमंत्री के आदेश देने के बाद भी राज्य में रोज़ाना बीस हजार टेस्ट नहीं हो पा रहे हैं। हर दिन राज्य के किसी ना किसी बड़े अस्पताल से अव्यवस्था, संसाधनों की कमी और रोते-बिलखते परिजन के हृदय को दहला देने वाले वीडियो सामने आ रहे हैं।

सवाल उठता है कि ‘बिहार में बहार है…’ का नारा देखकर मुख्यमंत्री का पद पाने वाले नीतीश कुमार, महामारी के वक्त में चुनाव करवाने को आतुर बीजेपी और राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी सामने से आती मुश्किल को देखेंगे? समझेंगे और वक्त रहते जरूरी कदम उठाएंगे?

बिहार में कोरोना का फैलाव और जिम्मेदार

राज्य में भी कोरोना वैसे ही फैला जैसे दुनियाभर में फैला। एक इंसान से दूसरे इंसान में। पहले विदेशों से आए लोग राज्य में कोरोना लेकर आए और फिर लॉकडाउन के दौरान ही जब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों, पैदल और साइकल से मरीज राज्य में दाखिल हुए तो कोरोना के मामलों में तेजी दिखी। मार्च और अप्रैल के महीने में राज्य के सरकारी डॉक्टर, नर्स और दूसरे मेडिकल स्टाफ अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से पीपीई किट मांग रहे थे। राज्य सरकार केंद्र सरकार से पीपीई किट मांग रही थी।

तस्वीर पटना की है। बिना मास्क के घूमने पर पुलिस कान पकड़वाकर उठक-बैठक लगवा रही है।

2 अप्रैल को बिहार के नीतीश कुमार ने कहा था कि बिहार सरकार ने पांच लाख पीपीई किट की मांग की है जबकि उसे मात्र चार हजार किट मुहैया कराई गई हैं। 10 लाख एन-95 मास्क की मांग की गई लेकिन केंद्र ने दिए मात्र 50 हज़ार। दस लाख सी प्लाई मास्क की मांग की गई थी और अभी तक मात्र एक लाख मिले हैं। 10 हज़ार आरएनए एक्सट्रैक्शन किट की मांग की गई और मिले हैं अभी तक मात्र 250।

इसका सीधा मतलब है कि जब राज्य में अलग-अलग वजहों से कोरोना के मरीज बढ़ रहे थे तो राज्य सरकार संसाधनों की कमी से जूझ रही थी और केंद्र सरकार से मदद मांग रही थी। अब कुछ आंकडे देख लीजिए। बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक, 29 अप्रैल तक राज्य में लगभग 70 हज़ार प्रवासी आ चुके थे।

30 अप्रैल से लेकर 3 मई के बीच राज्य में कुल 6,043 टेस्ट हुए। यानी हर दिन लगभग 1500 टेस्ट ही हो पा रहे थे। इतना ही नहीं, 4 मई से लेकर 8 मई के बीच केवल 2,316 सैम्पल की जाँच हुई यानी इन चार दिनों में हर दिन केवल 579 टेस्ट हुए।

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The lowest tests are being done in the country, the CM ordered to do 20 thousand tests daily, but the system is getting only 10,000.
महामारी के दौर में धूम्रपान भी जानलेवा, क्विट प्लान बनाकर छोड़ें आदत; महामारी के बाद एक लाख से ज्यादा लोगों ने छोड़ी स्मोकिंग

सिगरेट पीने के कारण लोगों के फेफड़ों में परेशानी, सांस लेने में दिक्कत तो होती ही है। मगर, महामारी के दौर में यह आदत और भी ज्यादा खतरनाक हो गई है। डब्ल्यूएचओ ने जून के आखिर में कहा था कि कोविड-19 की गंभीरता के बढ़ते मामलों और अस्पताल में मरीजों की मौत के तार स्मोकिंग से जुड़े हैं।

संगठन ने इसके बाद लोगों को स्मोकिंग छोड़ने की सलाह दी थी। स्मोकिंग से हमारे फेफड़ों की क्षमता को कम होती है और रेस्पिरेटरी इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में धुएं के आदि लोगों को भी महामारी से बचने के लिए यह आदत छोड़ना पड़ सकती है।

1 लाख से ज्यादा लोग छोड़ चुके हैं स्मोकिंग
एक्शन ऑन स्मोकिंग एंड हेल्थ (Ash) के सर्वे के अनुसार, कोविड-19 महामारी फैलने के बाद 1 लाख से ज्यादा लोगों ने स्मोकिंग से दूरी बना ली है। इनमें से बीते 4 महीनों में स्मोकिंग छोड़ने वाले 41 फीसदी लोग इसका कारण कोरोनावायरस को बताते हैं। इसके अलावा यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) ने पाया कि 2007 में इसका सर्वे शुरू होने के बाद अगर दूसरे वर्षों से तुलना की जाए तो जून 2020 तक सबसे ज्यादा लोगों ने स्मोकिंग छोड़ी है।

क्या हैं जोखिम?
कई डॉक्टर्स का मानना है स्मोकिंग नहीं करने वाले लोगों के मुकाबले स्मोकर्स ज्यादा गंभीर लक्षणों के जोखिम में हैं। जो कोविड सिम्प्टम ट्रैकर ऐप के अनुसार, नॉन स्मोकर्स की तुलना में स्मोकिंग करने वालों में कोरोनावायरस संक्रमण के तीन मुख्य माने जाने वाले लक्षणों (बुखार, लगातार खांसी, सांस में तकलीफ) के बनने की आशंका 14 प्रतिशत ज्यादा थी।

स्मोकिंग छोड़ने के लिए अपना कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं
कई लोग स्मोकिंग छोड़ने से डरते हैं, क्योंकि वे पहले भी कोशिश कर चुके, लेकिन असफल रहे। उन्हें लगता है कि यह बहुत कठिन है, क्योंकि वे छोड़ने के बाद होने वाले लक्षणों से उबर नहीं पाएंगे। उन्हें लगता है कि उनके पास कोई सपोर्ट नहीं है या वे इसमें सफल हो ही नहीं सकते हैं।

कुछ तरीके जिनकी मदद से आप में स्मोकिंग छोड़ने के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करेंगे

पहले एक दिन के लिए सिगरेट छोड़ने की कोशिश करें। फिर इसे दो दिन तक करें और क्रम को इसी तरह चलने दें।

रोल मॉडल्स को फॉलो करें। अपने आसपास के उन लोगों को देखें, जिन्होंने हाल ही में स्मोकिंग बंद की है। देखें कि आप उनके कौनसे तरीकों और प्रतिक्रियाओं को अपना सकते हैं।

हर कोशिश को मानें कि आप सीख रहे हैं। हर बार आपको पता लगता है कि क्या काम नहीं कर रहा और आपको सफल होने के लिए क्या करना होगा। आपको यह पता होना चाहिए कि स्मोकर्स के लिए बार-बार स्मोकिंग छोड़ना आम बात है, लेकिन वे बाद में सफल होते हैं।

स्मोकिंग छोड़ने को लेकर अपने निगेटिव मूड को सुधारें। कई लोगों को स्मोकिंग छोड़ते वक्त डर, तनाव और चिंता होती है। अपने आसपास परिवार और दोस्तों के भरपूर सपोर्ट को साथ रखें। अच्छे भोजन, एक्सरसाइज और पूरी नींद की मदद से हेल्दी लाइफस्टाइल तैयार करें।

स्मोकिंग छोड़ने के लिए "क्विट प्लान" तैयार करें
अगर आपने स्मोकिंग छोड़ने का फैसला कर लिया है तो यह बहुत अच्छी बात है। इसके लिए एक क्विट प्लान तैयार करें। इस प्लान में आपका अगला कदम, सलाह और सपोर्ट करने वाली चीजें शामिल होंगी। हमेशा याद रखें कि आप सफल हो सकते हैं।

ऐसे बनाएं "क्विट प्लान"

एक तारीख तय करें: जितना जल्दी हो सके स्मोकिंग छोड़ने के लिए तारीख चुनें। स्मोकिंग छोड़ने के लिए खुद को थोड़ा वक्त देना आपको फोकस और मोटिवेट रहने में मदद करेगा। बर्थडे या कोई जरूरी दिन चुनना अच्छा रहेगा, लेकिन आपको किसी नियम को मानने की जरूरत नहीं है। आप आज से भी स्मोकिंग बंद कर सकते हैं।

परिवार, दोस्तों और साथ काम करने वालों को बताएं: अपने फैसले के बारे में उन लोगों को जरूर बताएं जो आपसे ज्यादा संपर्क में रहते हैं। उन लोगों से सपोर्ट करने के लिए कहें। इसके अलावा अगर कोई साथी स्मोक करता है तो उसे समझने के लिए कहें। उन्हें बताएं कि अगर आप आसपास हैं तो स्मोक न करें।

चुनौतियों के बारे में पहले ही जान लें: स्मोकिंग छोड़ना आसान नहीं है और अगर आपने फैसला किया है तो आप बहादुर हैं। इस दौरान आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहें और खासतौर से पहले हफ्ते की मुश्किलों के लिए।

आपने आसपास से तंबाकू प्रोडक्ट्स हटा दें: सबसे जरूरी है तंबाकू के संपर्क में कम से कम आना। अगर आपके आसपास तंबाकू की चीजें हैं तो उन्हें हटा दें। स्मोकिंग एरिया में जाने से बचें और अपने साथियों को आपके सामने स्मोक न करने के लिए कहें।

सिगरेट में शामिल होते हैं 7 हजार से ज्यादा जहरीले कैमिकल्स
स्मोकिंग से केवल स्वास्थ्य ही नहीं आपके आसपास रहने वाले लोग भी प्रभावित होते हैं। डब्ल्यूएचओ की "ए गाइड टू फॉर टोबैको यूजर्स टू क्विट" के अनुसार, तंबाकू अपने करीब आधे यूजर्स को मार देता है क्योंकि तंबाकू प्रोडक्ट्स बहुत ही जहरीली चीजों से तैयार किए जाते हैं। तंबाकू स्मोक में 7 हजार से ज्यादा कैमिकल्स होते हैं, जिसमें से कम से कम 250 को हानिकारक और कम से कम 69 को कैंसर का कारण माना जाता है।

स्मोकिंग से जुड़े कुछ फर्जी दावे
खासतौर से विकासशील देशों में कई स्मोकर्स तंबाकू स्मोकिंग के खतरों को नहीं समझते हैं। इसके पीछे का कारण कंपनियों के गुमराह करने वाला डाटा बताया जाता है। ये रहे स्मोकिंग से जुड़े कुछ फर्जी दावे।

कम टार वाली सिगरेट सुरक्षित हैं: सुरक्षित सिगरेट जैसी कोई चीज नहीं होती है। कम टार वाली सिगरेट भी दूसरी सिगरेट की तरह हानिकारक हो सकती है।

खुद तंबाकू रोल कर बनाई गई सिगरेट सुरक्षित हैं: इस तरह की सिगरेट में भी कई कैमिकल्स होते हैं। रिसर्च बताती हैं कि खुद तंबाकू रोल कर बनाई गई सिगरेट भी फैक्ट्री में बनी सिगरेट के बराबर या उससे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है। स्टडीज में पता चला है कि खुद तंबाकू रोल कर सिगरेट बनाने वाले लोग ऐसी सिगरेट तैयार करते हैं जो ज्यादा टार और निकोटीन बनाती हैं।

सिगरेट की संख्या कम कर देने से हेल्थ रिस्क कम हो जाएंगे: सिगरेट पीने का कोई भी सुरक्षित स्तर नहीं है। कुछ लोग सिगरेट की संख्या को कम कर स्मोकिंग हैबिट को सुरक्षित बनाने की कोशिश करते हैं। इनमें से कई लोगों को काफी मुश्किल होती हैं और वे वापस उतनी ही सिगरेट दोबारा शुरू कर देते हैं। हालांकि, सिगरेट की संख्या कम करना जोखिम को थोड़ा कम जरूर कर देता है, लेकिन लंबे फायदे के लिए इसे छोड़ना ही बेहतर है।

केवल बुजुर्ग ही स्मोकिंग से बीमार होते हैं: स्मोकिंग करने वाले सभी लोगों में बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। सभी उम्र के लोग फेफड़ों की क्षमता कम होना, खांसी, जल्दी थकान जैसी शॉर्ट टर्म परेशानियों से जूझते हैं। स्मोकिंग सूंघने और स्वाद लेने की ताकत को भी खत्म करती है।

हर साल 80 लाख जानें लेता है तंबाकू
तंबाकू के नुकसान को सभी लोग जानते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, तंबाकू की वजह से होने वाली बीमारियों जैसे कार्डिवैस्क्युलर डिसीज, फेफड़ों की परेशानी, कैंसर, डायबिटीज और हाइपरटेंशन से हर साल 80 लाग लोग अपनी जान गंवा देते हैं। स्मोकिंग से रेस्पिरेटरी इंफेक्शन्स, कैंसर, अंधापन, नपुंसकता, हार्ट अटैक जैसी कई बीमारियां होती हैं। इसके अलावा अगर प्रेग्नेंट महिला तंबाकू सेवन करती है तो इससे कम वजन वाले बच्चे के जन्म की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।

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Smoking habit can be dangerous in Corona era, quit addiction by making "Quiet Plan"; 8 million deaths occur every year due to tobacco
6 विधायकों की सदस्यता खत्म करने के लिए बसपा स्पीकर के सामने याचिका दाखिल करेगी

बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस में शामिल हुए 6 विधायकों के खिलाफ कमर कस ली है। पार्टी ने अब विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष इन विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की याचिका लगाने का निर्णय लिया है। याचिका गुरुवार को लगाई जाएगी। वहीं, राजस्थान हाईकोर्ट के 24 जुलाई के यथास्थिति बनाए रखने के फैसले को स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

इधर, बसपा ने बुधवार को हाईकोर्ट में भी इन विधायकों के कांग्रेस में विलय को चुनौती देते हुए याचिका लगाई, जिस पर बहस हुई। प्रदेशाध्यक्ष भगवान सिंह बाबा ने बताया कि उच्च न्यायालय में याचिका पेश कर दी गई है। बुधवार को इस पर बहस पूरी नहीं हो पाई। गुरुवार को इस पर आगे की कार्रवाई होगी। बाबा ने कहा कि पार्टी ने धोखा देने वाले इन छह विधायकों और कांग्रेस को सबक सिखाना तय कर लिया है।

स्पीकर के जन्मदिन के कारण अब गुरुवार को पेश होगी याचिका

गुरुवार को बसपा विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी के समक्ष इन विधायकों की सदस्यता समाप्त किए जाने की याचिका पेश करेगी। याचिका बुधवार को ही पेश होनी थी। स्पीकर जोशी का बुधवार को जन्मदिन होने के कारण वे ऑफिस में नहीं बैठे। इसलिए गुरुवार को याचिका पेश करेंगे।

भगवान सिंह बाबा ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के दौरान भी हमने चुनाव आयोग और स्पीकर के समक्ष आवेदन किया था, जिसे चुनाव आयोग ने अधिकार क्षेत्र में नहीं होने और स्पीकर ने इन विधायकों का कांग्रेस में विलय हो जाने की बात कह आवेदन खारिज कर दिया था। हम इसी विलय के प्वाइंट को लेकर विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका लगा रहे हैं, क्योंकि विलय असंवैधानिक है।

संगठन स्तर पर भी चलाएंगे अभियान

बसपा प्रदेशाध्यक्ष भगवानसिंह बाबा ने कहा कि पार्टी और कार्यकर्ताओं के मिशन भाव को धोखा देने वाले इन छह विधायकों के खिलाफ संगठन स्तर पर भी जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि विधायकों द्वारा यह कहना कि वह क्षेत्र के विकास के लिए कांग्रेस में शामिल हुए तो हमारा यह कहना है कि क्या उन्हें चुनाव लड़ते समय मालूम नहीं था कि उनकी क्या हैसियत रहेगी।

बसपा के ये 6 विधायक कांग्रेस में शामिल हुए थे

लखन सिंह (करौली), राजेन्द्र सिंह गुढ़ा (उदयपुरवाटी), दीपचंद खेड़िया (किशनगढ़ बास), जोगेन्दर सिंह अवाना (नदबई), संदीप कुमार (तिजारा) और वाजिब अली (नगर भरतपुर)। यह सभी कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

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यह फोटो तब की है जब बसपा के 6 विधायक कांग्रेस में शामिल हुए थे। इस दौरान वे विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी को पत्र देने पहुंचे थे।
हेपेटाइटिस की दवा लेने वाले मरीजों में नहीं हुआ कोरोना का संक्रमण, पांच माह तक डेढ़ हजार लोगों पर हुई रिसर्च में किया दावा; अब बड़े स्तर पर ट्रायल की तैयारी

काला पीलिया की दवा लेने वाले मरीजों में कोरोना का संक्रमण नहीं हुआ। दुनियाभर के कई देशों में भी काला पीलिया यानी हेपेटाइटिस की दवा कोरोना से बचाव करने में मददगार साबित हुई है। यह दावा PGIMS रोहतक की रिसर्च में किया गया है। यहां के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग और नेशनल वायरल हेपेटाइटिस सेंट्रल प्रोग्राम के मॉडल ट्रीटमेंट सेंटर में डेढ़ हजार मरीजों पर रिसर्च की गई।

5 माह तक मरीजों की हुई मॉनिटरिंग
गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के हेड और सीनियर प्रोफेसर डॉ. प्रवीण मल्होत्रा ने दावा किया कि काला पीलिया की दवा कोविड-19 में कारगर है। 5 माह तक हेपेटाइटिस बी और सी का इलाज कराने वालों में डेढ़ हजार मरीजों को चिह्नित करके मार्च से जुलाई माह तक उनकी हेल्थ मॉनिटरिंग की गई।

रिसर्च में शामिल डेढ़ हजार मरीजों में नहीं दिखे लक्षण
शोधकर्ताओं के मुताबिक, रिसर्च में पाया गया कि काला पीलिया की दवा लेने वाले डेढ़ हजार मरीजों को कोरोना से मिलते-जुलते लक्षण नहीं आए और न ही कोरोना संक्रमित हुए। डॉ. प्रवीण मल्होत्रा के मुताबिक, स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से अगर इसका बड़े स्तर पर ट्रायल किया जाता है तो सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।

ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया को भेजा गया प्रपोजल
काला पीलिया में लेडिपसविर और डसाबूविर के साथ सोफासबूबिर का कॉम्बिनेशन दिया जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, कोरोना के मरीजों का इलाज करने के लिए यह कॉम्बिनेशन रेमेडेसिविर से ज्यादा बेहतर है। कोरोना के मरीजों पर इसका ट्रायल करने की तैयारी की जा रही है।

PGIMS रोहतक, इंटॉक्स प्राइवेट लिमिटेड और काउंसिल फॉर साइंटिफिक एंड इंस्ट्रीयल रिसर्च नेशनल केमिकल लेबोरेट्री के साथ मिलकर बड़े स्तर पर ट्रायल करेगा। इसके लिए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) को प्रपोजल भेजा गया है।

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Hepatitis C drugs to treat Covid Rohtak PGIMS moots clinical trials waiting to get nod from DCGI
क्या भारत बायोटेक 15 अगस्त को कोविड-19 की वैक्सीन लॉन्च कर रही है? ICMR की पुरानी चिट्‌ठी गलत दावे के साथ वायरल

क्या वायरल : सोशल मीडिया पर कुछ मैसेज वायरल हो रहे हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि भारत बायोटेक अपनी कोविड-19 वैक्सीन 15 अगस्त को लॉन्च करने जा रही है। दावा है कि भारत बायोटेक को देश की शीर्ष रिसर्च संस्था ICMR से वैक्सीन लॉन्च करने की अनुमति भी मिल गई है। वायरल हो रहे मैसेज के साथ ही ICMR का एक पत्र भी वायरल हो रहा है।

भारत में कोविड-19 की पहली वैक्सीन ‘को-वैक्सीन’ को हैदराबाद की फार्मा कंपनी भारत बायोटेक ने तैयार किया है। इसे आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे के साथ मिलकर बनाया गया है। जानवरों पर इसका ट्रायल कामयाब रहा है। वहीं ह्यूमन ट्रायल के लिए इस वैक्सीन को पिछले माह ही मंजूरी मिली है।

‘को-वैक्सीन’ के सुर्खियों में आने के बाद से ही लगातार इससे जुड़े भ्रामक दावे सोशल मीडिया पर किए जा रहे हैं।

मैसेज के साथ शेयर किया जा रहा ICMR का पत्र

दावे से जुड़े ट्वीट

Bharat bio tech vaccine Received permission from central government from 15 th August it will be available in market as corona vaccine . Great news today see official permission👆👆

— Nupur Chandra (@NupurChandra14) July 28, 2020

Bharat bio tech vaccine Received permission from central government ICMR from 15 th August it will be available in market. pic.twitter.com/ZlSMcSWLTM

— Jharkhand (@Jharkha16573909) July 24, 2020

Bharat bio tech vaccine Received permission from central government from 15 th August it will be available in market as corona vaccine . Great news today see official permission. @HiHyderabad @swachhhyd pic.twitter.com/tzshXwP7gk

— MOHD ISMAIL (@BIGGBEE9) July 21, 2020

फैक्ट चेक पड़ताल

वायरल हो रहे पत्र को पढ़ने पर पता चलता है कि इसमें वैक्सीन लॉन्च करने की अनुमति जैसा कुछ लिखा ही नहीं है।

2 जुलाई, 2020 को यह पत्र इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने भारत बायोटेक को लिखा था। इसमें ICMR ने भारत बायोटेक से 15 अगस्त, 2020 से पहले वैक्सीन लॉन्च करने को कहा गया है। पत्र में यह भी लिखा है कि आदेश का पालन नहीं करने को बहुत गंभीर माना जाएगा। इसलिए आपको (भारत बायोटेक को) सलाह है कि आप इस प्रोजेक्ट को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दें और तय समय में इसे पूरा करें।

अब सवाल यह है कि वायरल हो रहा पत्र असली है या नहीं। दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर एक माह पहले छपी एक खबर से स्पष्ट होता है कि ICMR ने सच में भारत बायोटेक को इस तरह का पत्र लिखा था।

दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर 25 दिन पहले प्रकाशित एक खबर से पता चलता है कि ट्रायल में तेजी लाने के लिए लिखा गया यह पत्र एक महीने पहले भी वायरल हुआ था। इसके बाद ICMR के महानिदेशक बलराम भार्गव ने सफाई देते हुए कहा था, भारतीय लोगों की सुरक्षा और उनका हित हमारे लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। हमने पुराने पत्र में यह कहा था कि ट्रायल में बेवजह की अड़चनों से बचने की कोशिश की जाए। बिना आवश्यक प्रक्रिया को दरकिनार किए ट्रायल में तेजी लाई जाए।

15 अगस्त तक वैक्सीन लॉन्च करने की बात पर एक्सपर्ट्स ने भी चेतावनी दी थी। कहा था कि समय से पहले वैक्सीन रिलीज करना फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। 1955 में ओरिजिनल साल्क पोलियो की वैक्सीन को बनाने में जल्दबाजी दिखाई गई थी, लेकिन इससे कोई अच्छे परिणाम नहीं मिले। बड़े स्तर पर वैक्सीन के निर्माण में हुई गड़बड़ी के कारण 70 हजार बच्चे पोलियो की चपेट में आ गए थे। 10 बच्चों की मौत हो गई थी।

जिस पत्र पर ICMR पहले ही सफाई दे चुका है। उसके आधार पर अब सोशल मीडिया पर 15 अगस्त को वैक्सीन लॉन्च होने का दावा किया जा रहा है।

निष्कर्ष: 15 अगस्त को वैक्सीन लॉन्च करने की अनुमति मिलने वाली बात झूठी है। ICMR के पुराने पत्र का गलत दावे के साथ शेयर किया जा रहा है।

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Fact Check : Bharat Biotech launching the Kovid-19 vaccine on August 15? ICMR's old letter viral with false claim