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राम मंदिर के गर्भगृह में 200 फीट गहराई में रखा जाएगा टाइम कैप्सूल, इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी ऐसा पहले भी कर चुके हैं

अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर की नींव रखी जाएगी। इससे पहले राम मंदिर नींव के भीतर टाइम कैप्सूल रखे जाने को लेकर खूब चर्चा है। यह कैप्सूल क्या है? क्या ऐसा पहली बार हो रहा है? ऐसे तमाम सवाल लोगों के मन में चल रहे हैं। दरअसल, बताया जा रहा है कि राम मंदिर का इतिहास हजारों साल तक मौजूद रहे, इसके लिए मंदिर के गर्भगृह की 200 फीट गहराई में टाइम कैप्सूल रखा जाएगा।

इस टाइम कैप्सूल पर मंदिर का पूरा विवरण और इतिहास लिखा रहेगा, ताकि भविष्य में जन्मभूमि और राम मंदिर का इतिहास देखा जा सके और कोई विवाद न हो। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने मीडिया को सबसे पहले यह जानकारी दी थी।

बिहार के रहने वाले कामेश्वर चौपाल वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने 9 नवंबर 1989 को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए आधारशिला रखी थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण के लिए बने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में उन्हें सदस्य भी बनाया गया है।

1989 में भी भूमि के नीचे दबाया गया था ताम्र लेख
राम मंदिर के चीफ आर्किटेक्ट निखिल सोमपुरा बताते हैं कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के बाद मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा। उनके मुताबिक 200 मीटर गहराई की मिट्टी का सैंपल लिया गया था, लेकिन अभी उसकी रिपोर्ट नहीं आई है। रिपोर्ट के आधार पर ही मंदिर का निर्माण करने वाली कंपनी एलएनटी नींव की खुदाई शुरू कर देगी।

टाइम कैप्सूल क्या होता है?

टाइम कैप्सूल एक कंटेनर की तरह होता है और हर तरह के मौसम को सहन करने की इसमें क्षमता होती है। अयोध्या में राम मंदिर के नीचे डाला जाने वाला टाइम कैप्सूल कुछ सदियों के बाद एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में जाना जाएगा। टाइम कैप्सूल को एक ऐसे ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेज के रूप में जाना जाता है, जिसमें किसी काल की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति का उल्लेख हो। यह दस्तावेज ताम्र पत्र पर लिखा जाएगा।

टाइम कैप्सूल पर क्या लिखा जाएगा?

इस ताम्र पत्र पर मंदिर का संक्षिप्त इतिहास, शिलान्यास की तारीख, भूमिपूजन करने वाले मुख्य अतिथि, उपस्थित विशिष्टजन का नाम, निर्माण की शैली तथा वास्तुविद का नाम लिखा रहेगा। ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल के अनुसार, ताम्र लेख तैयार करने की जिम्मेदारी दिल्ली की एक कंपनी को सौंपी गई है।

1989 में भी जब राममंदिर का शिलान्यास हुआ था, तब भी एक ताम्र लेख भूमि के नीचे दबाया गया था

इस बीच, यह जानकारी भी सामने आई है कि साल 1989 में जब गर्भगृह के सामने राममंदिर का शिलान्यास हुआ था, उस वक्त भी एक ताम्र लेख भूमि के नीचे दबाया गया था। रामलला की ओर से मुकदमे की पैरवी करने वाले वकील त्रिलोकीनाथ पांडेय बताते हैं कि उस वक्त ताम्र लेख विश्व हिन्दू परिषद के महासचिव अशोक सिंहल ने तैयार कराया था। पांडेय बताते हैं कि ताम्रपत्र तांबे से बनाया जाता है, क्योंकि इस धातु में जंग नहीं लगती है। यह लेख मिट्टी में भी हजारों साल तक सुरक्षित रहेगा।

जब इंदिरा गांधी ने बनवाया टाइम कैप्सूल
भारत में पहले भी ऐसे टाइम कैप्सूल ऐतिहासिक महत्व की इमारतों की नींव में डाले जा चुके हैं। 1973 में इंदिरा गांधी सरकार ने लालकिले की नींव में ऐसा ही एक टाइम कैप्सूल डाला था। तब इसे काल-पत्र का नाम दिया गया था। उस वक्त विपक्ष के लोगों ने इंदिरा गांधी के इस कदम की काफी आलोचना की थी और आरोप लगाया था कि इस काल-पत्र में इंदिरा गांधी ने अपने परिवार का महिमामंडन किया है।

इंदिरा सरकार के काल-पत्र में क्या लिखा था, उसका राज आज तक नहीं खुल सका

इंदिरा गांधी की सरकार ने अतीत की अहम घटनाओं को दर्ज करने का काम इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च यानी आईसीएचआर को सौंपा था और मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के इतिहास के प्रोफेसर एस कृष्णासामी को पूरी पाण्डुलिपि तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन यह काम पूरा होने से पहले ही विवादों में फंस गया और इंदिरा सरकार के इस काल-पत्र में क्या लिखा था, उसका राज आज तक नहीं खुल सका।

1977 में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। सरकार गठन के कुछ दिनों बाद टाइम कैप्सूल को निकाला गया, लेकिन जनता पार्टी की सरकार ने इस बात का रहस्योद्घाटन नहीं किया कि उस टाइम कैप्सूल में क्या था? बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय से मांगी गई एक जानकारी में बताया गया था कि पीएमओ को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है।

मोदी भी बनवा चुके हैं टाइम कैप्सूल
टाइम कैप्सूल के विवाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी जुड़ा रहा है। नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो 2011 में उन पर भी टाइम कैप्सूल दफनाने का विपक्ष ने आरोप लगाया था। विपक्ष का कहना था कि गांधीनगर में निर्मित महात्मा मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल दफनाया गया है, जिसमें मोदी ने अपनी उपलब्धियों का बखान किया है।

2017 में स्पेन में 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल निकला था
30 नवंबर 2017 को स्पेन के बर्गोस में करीब 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल निकला था, जो ईसा मसीह की मूर्ति के रूप में था। मूर्ति के भीतर साल 1777 के आसपास की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जानकारियां थीं।

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अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर की नींव रखी जाएगी। इससे पहले राम मंदिर नींव के भीतर टाइम कैप्सूल रखे जाने को लेकर खूब चर्चा है।
2100 तक भारत में लोगों की संख्या घटकर 109 करोड़ रह जाएगी, सबसे अधिक आबादी वाले चीन में 80 साल बाद जनसंख्या आधी हो जाएगी

हाल ही में जारी की गई लैंसेट की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की आबादी 2064 में पीक पर होगी। इसके बाद ये घटने लगेगी। इससे पहले यूएन ने 2100 में इसके पीक पर पहुंचने का अनुमान लगाया था। रिपोर्ट के मुताबिक 2064 में दुनिया की आबादी 973 करोड़ हो जाएगी। 2100 तक ये घटकर 879 रह जाएगी। भारत दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश होगा। लेकिन, उसकी आबादी 2048 के बाद घटने लगेगी।

इस ग्लोबल पॉपुलेशन प्रोजेक्शन रिपोर्ट में आने वाले 80 सालों में दुनिया की आबादी के बारे में कई तरह के फैक्ट्स हैं। जैसे- आने वाले 80 साल बाद भारत और दुनिया के अन्य देशों की आबादी कितनी होगी। कब तक बढ़ेगी और कब से घटेगी? किन देशों की आबादी तेजी से घटेगी? कौन से देश ऐसे हैं जिनकी आबादी आज की आबादी से आधी रह जाएगी?

ग्लोबल फर्टीलिटी रेट 2100 तक घटकर 1.66 हो जाएगा। भारत समेत दुनिया के उन देशों में फर्टिलिटी रेट 70% तक कम होगा जिनकी आबादी ज्यादा है। 2100 भारत की फर्टिलिटी रेट में 68% तक घट जाएगा। 138 करोड़ आबादी वाले देश भारत में 2100 तक 28% लोग कम हो जाएंगे।

सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों में शामिल रूस, जापान, ब्राजील 2100 तक टॉप टेन से बाहर हो जाएंगे

21 करोड़ आबादी वाला देश ब्राजील आबादी के लिहाज से इस वक्त दुनिया का 6वां सबसे बड़ा देश है। 2100 में इसकी आबादी घटकर 16.5 करोड़ रह जाएगी। जापान की आबादी 80 साल में आधी से कम हो 6 करोड़ हो जाएगी और वो दुनिया में 38वें नंबर पर आ जाएगा। 2017 के बाद से रूस और जापान की आबादी लगातार घट रही है।

पाकिस्तान को छोड़कर दक्षिण एशिया के हर देश की आबादी घटेगी

2100 में पाकिस्तान को छोड़कर दक्षिण एशिया के सभी देशों की आबादी आज के मुकाबले कम होगी। भारत की आबादी आज के मुकाबले करीब 21% कम होगी तो बांग्‍लादेश में आज के मुकाबले आधे लोग रह जाएंगे। वहीं, पाकिस्तान की आबादी 80 साल बाद 16% बढ़ेगी। हालांकि, वहां पीक 2062 में आएगा। जब वहां आज के मुकाबले करीब 47% ज्यादा आबादी होगी।

2100 तक चीन की आबादी लगभग आधी हो जाएगी। भारत की आबादी 32% घटेगी। बांग्लादेश की आबादी भी करीब आधी हो जाएगी। जबकि इंडोनेशिया आबादी मामूली घटेगी। तो पाकिस्तान की बढ़ेगी। इसके बाद भी बांग्लादेश को छोड़कर, एशिया के इन पांच देशों में से चार देश विश्व के सबसे ज्यादा आबादी वाले दस देशों में अभी की तरह बने रहेंगे। पाकिस्तान इंडोनेशिया से ऊपर चला जाएगा, लेकिन एशिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले पांच देशों की लिस्ट में कोई बदलाव नहीं होगा।

2017 में दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले 10 देशों में से चार देश जापान, रूस, बांग्लादेश, और ब्राजील 2100 में टॉप 10 से बाहर हो जाएंगे। 2100 में इनकी जगह, तंजानिया, मिस्र, इथोपिया और कांगो दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले दस देशों में होंगे। अभी कांगो की आबादी 8 करोड़ 80 लाख है। वो आबादी के लिहाज से 18वें नंबर पर है।

इथोपिया की आबादी अभी 10 करोड़ 2 लाख है जो दुनिया में 13 वें नंबर पर है,मिस्र की आबादी अभी 9 करोड़ 60 लाख है जो कि दुनिया में 14वें नंबर पर है और तंजानिया की आबादी 5 करोड़ 30 लाख है जो दुनिया में 24वें नंबर पर है। मिस्र को छोड़कर बाकी तीन देश अफ्रीका से हैं।

वर्किंग एज पॉपुलेशन मतलब 20-64 साल के उम्र के लोगों की आबादी। 2100 में भारत वर्किंग एज पॉपुलेशन में भी दुनिया में नंबर एक पर होगा। चीन की वर्किंग एज पॉपुलेशन करीब 70% घटेगी लेकिन चीन की जनसंख्या ज्यादा होने के कारण, वह 2100 में भी दुनिया में दूसरे नंबर पर बना रहेगा।

नोट- 2017 में चाइल्ड एज पॉपुलेशन और वर्किंग एज पॉपुलेशन को वर्ल्ड बैंक के मुताबिक है। जो 0-14 और 15-64 होती है। लैंटस की रिपोर्ट में इसे 0-19 और 20-65 लिया गया है। 2017 की तुलना में 2100 के प्रोजेक्शन के अंतर में थोड़ा बदलाव हो सकता है।

पहले भी रिसर्च में देखा गया है कि हर शताब्दी में, हर देश के सामने दो बार उतार-चढ़ाव आते हैं। एक बार आबादी घटती है जबकि एक ही शताब्दी में दूसरी बार आबादी बढ़ती है। जिस साल में सबसे ज्यादा होती है उसे पीक ईयर पॉपुलेशन कहा जाता है। चीन में सबसे ज्यादा आबादी अभी के दशक में बढ़ रही है।

जापान में पीक ईयर 2017 में था, स्पेन और थाईलैंड भी पीक ईयर क्रॉस कर चुके हैं। अब इस प्वाइंट से आबादी घटेगी। ग्लोबल लाइफ एक्सपेक्टेंसी 70-80 साल की होती है, इसीलिए आने वाले 50 साल से 80 साल तक इन सभी देशों में नेचुरल डेथ रेट पीक पर होगा और 2100 तक आबादी आधी हो जाएगी

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World (India) Population Projections 2100 Update | What Will Be World and India Population Be In 2100? Everything Thing You Need To Know In Latest Research
सुशांत की मौत की सीबीआई जांच नहीं होगी, राजस्थान में वीडियो से बवाल; इन 5 राशि वालों को आज थोड़ा संभलकर रहना होगा

तारीख है 31 जुलाई और दिन है शुक्रवार का। अगर कोरोनावायरस नहीं आया होता, तो आज नई फिल्म रिलीज होती। खैर, आज हॉटस्टार पर कुणाल खेमू और रसिका दुग्गल की लूटकेस फिल्म रिलीज होगी। ये कॉमेडी फिल्म है। कोरोना के टाइम में तो देख ही सकते हैं। ये तो हो गई फिल्म की बात। अब जल्दी से कुछ खबरों से भी गुजर लेते हैं।

1. अयोध्या में क्या चल रहा है?
राम मंदिर निर्माण के लिए 5 अगस्त को भूमि पूजन होना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें शामिल होंगे। लेकिन, पूजन होता, उससे पहले ही यहां कोरोना पहुंच गया है।

खबर आई है कि रामलला मंदिर के प्रधान पुजारी आचार्य सतेंद्र दास के शिष्य प्रदीप दास कोरोना संक्रमित हो गए हैं। प्रदीप दास रामलला मंदिर के सहायक पुजारी भी हैं। सिर्फ पुजारी ही नहीं, बल्कि राम जन्मभूमि में तैनात 16 पुलिसवालों के भी कोरोना पॉजिटिव होने की खबर है।

हालांकि, पुजारी और पुलिसवालों के कोरोना पॉजिटिव होने की बात यहां के सीडीओ प्रथमेश कुमार खारिज कर चुके हैं।

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2. राजस्थान के बवाल में नया क्या?
अब बात राजस्थान की। 20 दिन से ज्यादा हो गए, लेकिन यहां का बवाल शांत होता नहीं दिख रहा है। या तो सरकार गिरेगी? या तो बचेगी? तभी शांत होगा। खैर, इस घमासान के बीच राजस्थान विधानसभा के स्पीकर सीपी जोशी का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत भी हैं। असल में ये वीडियो दोनों की बातचीत का है।

इस वायरल वीडियो में स्पीकर सीपी जोशी मुख्यमंत्री के बेटे वैभव से कह रहे हैं 'मामला टफ हो गया है।' फिर वैभव कहते हैं 'राज्यसभा के वक्त ही खबरें आ गई थीं। जिस तरह से माहौल खराब हो रहा है। इन्होंने 10 दिन राज्यसभा चुनाव के निकाले, फिर वापस।'

वैभव को सीपी जोशी जवाब देते हैं '30 आदमी निकल जाते हैं, तो आप कुछ नहीं कर सकते। हल्ला करते रहते। वो सरकार गिरा देते। अपने हिसाब से उन्होंने कॉन्टैक्ट करके करवा लिया है। बाकी दूसरे के बस की बात नहीं है।'

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3. सुशांत की मौत का मामला कहां तक पहुंचा?
सुशांत सिंह राजपूत की मौत को डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए और हर दिन इस मामले में कुछ न कुछ नया मोड़ आ ही रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने सुशांत की मौत की सीबीआई जांच कराने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में अल्का प्रिया ने पीआईएल लगाई थी और मांग की थी कि इसकी जांच सीबीआई करे। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि पुलिस को उनका काम करने दीजिए।

उससे पहले महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने भी कहा कि इस मामले की सीबीआई जांच की जरूरत नहीं है। मुंबई पुलिस इसकी जांच में सक्षम है।

उधर सुशांत के पिता केके सिंह का कहना है कि उन्हें मुंबई में हो रही जांच पर भरोसा नहीं है। इसलिए वो चाहते हैं कि पटना पुलिस भी मामले की जांच करे।

कहा तो ये भी जा रहा है कि सुशांत ने मुंबई में आत्महत्या की थी। ऐसे में पटना में जो एफआईआर दर्ज हुई, वो जीरो एफआईआर मानी जाएगी और जांच मुंबई पुलिस ही करेगी।

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4. मणिपुर में असम राइफल्स पर किसने हमला किया?
ये खबर बुरी है। दरअसल, 29 जुलाई की शाम पौन 7 बजे मणिपुर में असम राइफल्स के जवानों पर हमला हुआ। इस हमले में 3 जवान शहीद हो गए। 5 जख्मी भी हुए हैं, जिन्हें सेना के अस्पताल में भर्ती किया गया है।

ये हमला जहां हुआ है, वो जगह भारत-म्यांमार सीमा से बस 3 किमी दूर है। हमला खोंगताल में हुआ, जो मणिपुर के चंदेल जिले में पड़ता है। अब जो पता चला है, वो ये कि असम राइफल्स के 13 जवानों की टुकड़ी अपनी पोस्ट पर लौट रही थी। रास्ते में आईईडी ब्लास्ट हो गया। इसके बाद घात लगाकर बैठे उग्रवादियों ने फायरिंग कर दी।

ये हमला किसने किया? अभी तक पता नहीं चला है। हालांकि, शक है कि इस हमले के पीछे मणिपुर का लोकल्स ग्रुप पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का हाथ हो सकता है।

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5. कब होगी नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड सेरेमनी?
कोरोनावायरस का असर खेलों पर तो पड़ा और अब अवॉर्ड सेरेमनी पर भी पड़ने वाला है। एक खबर आई है कि इस साल 29 अगस्त को जो नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड सेरेमनी होनी थी, उसकी तारीख कोरोना की वजह से एक या दो महीने आगे बढ़ सकती है। हालांकि, राष्ट्रपति भवन की तरफ से अभी जवाब आना बाकी है।

29 अगस्त को हॉकी के खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती है। इसी दिन राष्ट्रीय खेल दिवस भी होता है। इसलिए इस दिन राष्ट्रपति राजीव गांधी खेल रत्न, अर्जुन, द्रोणाचार्य और ध्यानचंद अवॉर्ड देते हैं। ये सेरेमनी भी राष्ट्रपति भवन में ही होती है।

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6. कैसा होगा आज का दिन?
जाते-जाते सबसे जरूरी बात कि आज का राशिफल क्या कहता है? तो आज शुक्रवार को ज्येष्ठा नक्षत्र में चंद्रमा होने से चर और इंद्र नाम के दो शुभ योग बन रहे हैं। इनका असर मेष, वृषभ, सिंह, वृश्चिक, मकर, कुंभ और मीन राशि वाले लोगों पर पड़ेगा। इसका फायदा भी है। इन 7 राशि वाले लोगों को जॉब और बिजनेस में आगे बढ़ने के मौके मिल सकते हैं।

लेकिन, अगर आपकी राशि मिथुन, कर्क, कन्या, तुला या धनु है, तो आपको आज थोड़ा संभलकर रहना होगा। क्योंकि इन 5 राशि वालों के कामकाज में रुकावटें आने की आशंका है।

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Man held after wife forced to carry him on shoulders over 'infidelity'
The police action came after a video of the incident went viral on Wednesday, in which the woman is seen carrying her husband on her shoulders as a punishment while villagers, carrying sticks, can be seen heckling her.
July 30, 2020 at 05:18PM
New National Education Policy: Youngsters elated, but worry about Boards
Students react to the new features introduced in National Education Policy 2020, which has been given a nod by the Union Cabinet.
July 30, 2020 at 04:43PM
देश में सबसे कम टेस्ट यहीं हो रहे हैं; सीएम ने रोज 20 हजार टेस्ट करने का आदेश दिया, लेकिन व्यवस्था बस 10 हजार की हो पा रही है

22 मार्च, 1912 इतिहास की वो महत्वपूर्ण तारीख़ है जिस दिन बिहार का बतौर राज्य जन्म हुआ। बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग होकर एक राज्य बनने से एक साल पहले यानी 1911 से 1920 के बीच इस राज्य में करीब चार लाख लोग प्लेग नामक बीमारी से मारे गए। वहीं, 1909-10 में बिहार के लगभग सभी जिले मलेरिया की चपेट में आ गए थे। मुजफ्फरपुर में हैजा से लोग मर रहे थे। पटना, शाहाबाद, सारण, हाजीपुर और मुंगेर में प्लेग महामारी बन चुका था।

सारण में लगभग बीस हजार और मुंगेर में लगभग साढ़े चार हजार लोगों की मौत हुई लेकिन सबसे बुरा हुआ 1918 में। इस साल पूरी दुनिया में एक स्पैनिश फ़्लू फैला। तब पहले से ही हजार मुश्किलों से जूझ रहा बिहार भी इसकी चपेट में आया और छ महीने से भी कम समय में 6 लाख लोग मारे गए। आज एक बार फिर पूरी दुनिया एक अनजान वायरस और बीमारी से जूझ रही है। एक बार फिर बिहार इस वायरस की चपेट में हैं और दिन पर दिन बड़ी त्रासदी की तरफ बढ़ रहा है।

देशभर के मुक़ाबले बिहार में सबसे कम टेस्ट हो रहे हैं। सरकार ने 20 हजार रोजाना टेस्ट करने का आदेश दिया है, लेकिन टारगेट पूरा नहीं हो पा रहा है।

बिहार में कोरोना का पहला मामला 22 मार्च को सामने आया था और 25 जुलाई को एक दिन में सबसे ज्यादा 2803 नए कोरोना संक्रमित मरीज मिले हैं। अभी राज्य में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर 45919 हो गई है। वहीं, राज्य में 14 कोरोना संक्रमित मरीजों की इलाज के दौरान मौत हो चुकी हैं। ये स्थिति तब है जब राज्य में देशभर के मुक़ाबले सबसे कम टेस्ट हो रहे हैं।

ख़बर है कि मुख्यमंत्री द्वारा हर रोज बीस हज़ार टेस्ट करने का आदेश देने के बाद भी बिहार की व्यवस्था बहुत ज़ोर लगाने के बाद दस हजार टेस्ट रोज कर पा रही है। इस वजह से अभी भी साफ-साफ पता नहीं चल पा रहा है कि राज्य में कोरोना के कुल कितने मरीज हैं और संकट वाक़ई कितना बड़ा है?

अब एक नजर डाल लीजिए राज्य में उपलब्ध सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर जो पिछले कई सालों से ख़ुद ‘आईसीयू’ में भर्ती है। सबसे बड़ी विडम्बना भी यही है कि इसी बीमार व्यवस्था के सहारे बिहार कोरोना जैसे अनजान और ख़तरनाक वायरस से मुकाबला कर रहा है।

तस्वीर पटना की है, जहां एक हेल्थ कर्मी कोरोना की जांच के लिए सैंपल ले रहा है।

क्या कहते हैं आँकड़े?

बिहार में परमानेंट डॉक्टर के कुल 6261 पद हैं मगर फ़िलहाल सिर्फ 3821 डॉक्टर बहाल हैं और 2440 पद खाली हैं. बिहार में ठेके पर रखे जाने वाले डॉक्टर के कुल 2314 पद हैं मगर फ़िलहाल महज 531 डॉक्टर बहाल हैं. दोनों के कुल 8575 पदों में 50 प्रतिशत पद खाली हैं. बिहार की हर एक लाख जनसंख्या पर मात्र 4 डॉक्टर और 2 नर्स हैं जो देश में सबसे कम है।

बिहार में स्थाई और ठेके पर रखे जाने वाले नर्सों के कुल मिलाकर 5331 पद हैं जिसमें मात्र 2302 नर्स बहाल हैं और बाकी 3029 पद खाली हैं. लगभग 57 प्रतिशत की वैकेंसी है। ये हालत पिछले 15 सालों से है। 12.5 करोड़ की आबादी वाले बिहार में आज सिर्फ 4352 सरकारी डॉक्टर हैं और यही वजह है कि बिहार में हर साल चमकी बुखार, लू लगने और ठनक गिरने (आकाशीय बिजली) की वजह से ही सौ-दो सौ लोगों की मौत हो जाती है।

अब क्या किया जा सकता है?इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने जॉर्ज इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ के साथ बतौर सीनियर रिसर्च फेलो जुड़े और बिहार से वास्ता रखने वाले डॉक्टर विकास केसरी से सम्पर्क किया। बकौल डॉक्टर विकास आज की तारीख में बिहार के पास बहुत सीमित रास्ते हैं।

तस्वीर एनएमसीएच पटना की है, जहां कोरोना संक्रमित मरीज को इमरजेंसी वार्ड में स्वास्थ्यकर्मी ले जाते हुए।

वो कहते हैं,“साफ दिख रहा है कि जब देश के कई राज्यों में जब कोरोना के मामले कम होंगे, तब बिहार में इस वायरस का प्रकोप चरम पर रहेगा। बिहार पर हर तरफ से संकट है। आर्थिक स्थिति ख़राब है। साक्षरता और जागरूकता का स्तर भी कम है। बाढ़ का संकट अलग है। ये सब मिलकर आने वाले दिन में बिहार के लिए बड़ा संकट पैदा करने वाले हैं।”

डॉक्टर विकास केसरी अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “बिहार सरकार को मदद मांगनी होगी। जल्दी से जल्दी। वहीं केंद्र सरकार को बिहार में कुछ रेडिकल करना होगा। जैसे, देशभर से एक्सपर्ट वहां भेजे जाएं। राज्य के पांच बड़े अस्पतालों में जल्दी से जल्दी कम से कम दो-तीन सौ फुल ऑक्सीजन वाले बेड तैयार किए जाएं। इसके बाद राज्य का पूरा का पूरा हेल्थ सिस्टम विशेषज्ञ डॉक्टरों के हवाले किया जाए."

डॉक्टर विकास केसरी इस बातचीत में इतना तक कहते हैं कि अगर वक्त रहते हुए ये सब नहीं किया गया तो आने वाले दिन बिहार के लिए बहुत मुश्किल होने वाले हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन बातों की तरफ अकेले डॉक्टर विकास केसरी जैसे विशेषज्ञ इशारा कर रहे हैं।

19 जुलाई को बिहार में बढ़ते कोरोना के मामलों की खोज-ख़बर लेने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक विशेष टीम पहुंची थी। इस टीम ने जो सुझाव दिए हैं, उसमें कहा गया है कि राज्य सरकार को टेस्टिंग का तरीक़ा बदलना होगा। टीम ने कहा कि ट्रैकिंग, टेस्टिंग और ट्रीटमेंट पर जोर दिया जाना चाहिए। टीम ने 19 जुलाई को वही कहा जो कोरोना फैलने के पहले दिन से कहा जा रहा है।

बिहार में कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं, बुधवार तक राज्य में संक्रमितों की संख्या बढ़कर 45,919 हो गई है।

इतना ही नहीं, इसी बीच बिहार सरकार ने 27 जुलाई को स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को दूसरी बार बदल दिया। सरकार ने कोरोना संकट के बीच, वरिष्ठ आईएएस (IAS) अधिकारी प्रत्यय अमृत को स्वास्थ्य विभाग में प्रधान सचिव की जिम्मेदारी सौंप दी।

आने वाले दिनों में होने वाली मुश्किलों का अंदाज़ा अभी से हो रहा है। पहले से बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था और चरमरा गई है। मुख्यमंत्री के आदेश देने के बाद भी राज्य में रोज़ाना बीस हजार टेस्ट नहीं हो पा रहे हैं। हर दिन राज्य के किसी ना किसी बड़े अस्पताल से अव्यवस्था, संसाधनों की कमी और रोते-बिलखते परिजन के हृदय को दहला देने वाले वीडियो सामने आ रहे हैं।

सवाल उठता है कि ‘बिहार में बहार है…’ का नारा देखकर मुख्यमंत्री का पद पाने वाले नीतीश कुमार, महामारी के वक्त में चुनाव करवाने को आतुर बीजेपी और राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी सामने से आती मुश्किल को देखेंगे? समझेंगे और वक्त रहते जरूरी कदम उठाएंगे?

बिहार में कोरोना का फैलाव और जिम्मेदार

राज्य में भी कोरोना वैसे ही फैला जैसे दुनियाभर में फैला। एक इंसान से दूसरे इंसान में। पहले विदेशों से आए लोग राज्य में कोरोना लेकर आए और फिर लॉकडाउन के दौरान ही जब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों, पैदल और साइकल से मरीज राज्य में दाखिल हुए तो कोरोना के मामलों में तेजी दिखी। मार्च और अप्रैल के महीने में राज्य के सरकारी डॉक्टर, नर्स और दूसरे मेडिकल स्टाफ अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से पीपीई किट मांग रहे थे। राज्य सरकार केंद्र सरकार से पीपीई किट मांग रही थी।

तस्वीर पटना की है। बिना मास्क के घूमने पर पुलिस कान पकड़वाकर उठक-बैठक लगवा रही है।

2 अप्रैल को बिहार के नीतीश कुमार ने कहा था कि बिहार सरकार ने पांच लाख पीपीई किट की मांग की है जबकि उसे मात्र चार हजार किट मुहैया कराई गई हैं। 10 लाख एन-95 मास्क की मांग की गई लेकिन केंद्र ने दिए मात्र 50 हज़ार। दस लाख सी प्लाई मास्क की मांग की गई थी और अभी तक मात्र एक लाख मिले हैं। 10 हज़ार आरएनए एक्सट्रैक्शन किट की मांग की गई और मिले हैं अभी तक मात्र 250।

इसका सीधा मतलब है कि जब राज्य में अलग-अलग वजहों से कोरोना के मरीज बढ़ रहे थे तो राज्य सरकार संसाधनों की कमी से जूझ रही थी और केंद्र सरकार से मदद मांग रही थी। अब कुछ आंकडे देख लीजिए। बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक, 29 अप्रैल तक राज्य में लगभग 70 हज़ार प्रवासी आ चुके थे।

30 अप्रैल से लेकर 3 मई के बीच राज्य में कुल 6,043 टेस्ट हुए। यानी हर दिन लगभग 1500 टेस्ट ही हो पा रहे थे। इतना ही नहीं, 4 मई से लेकर 8 मई के बीच केवल 2,316 सैम्पल की जाँच हुई यानी इन चार दिनों में हर दिन केवल 579 टेस्ट हुए।

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The lowest tests are being done in the country, the CM ordered to do 20 thousand tests daily, but the system is getting only 10,000.
महामारी के दौर में धूम्रपान भी जानलेवा, क्विट प्लान बनाकर छोड़ें आदत; महामारी के बाद एक लाख से ज्यादा लोगों ने छोड़ी स्मोकिंग

सिगरेट पीने के कारण लोगों के फेफड़ों में परेशानी, सांस लेने में दिक्कत तो होती ही है। मगर, महामारी के दौर में यह आदत और भी ज्यादा खतरनाक हो गई है। डब्ल्यूएचओ ने जून के आखिर में कहा था कि कोविड-19 की गंभीरता के बढ़ते मामलों और अस्पताल में मरीजों की मौत के तार स्मोकिंग से जुड़े हैं।

संगठन ने इसके बाद लोगों को स्मोकिंग छोड़ने की सलाह दी थी। स्मोकिंग से हमारे फेफड़ों की क्षमता को कम होती है और रेस्पिरेटरी इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में धुएं के आदि लोगों को भी महामारी से बचने के लिए यह आदत छोड़ना पड़ सकती है।

1 लाख से ज्यादा लोग छोड़ चुके हैं स्मोकिंग
एक्शन ऑन स्मोकिंग एंड हेल्थ (Ash) के सर्वे के अनुसार, कोविड-19 महामारी फैलने के बाद 1 लाख से ज्यादा लोगों ने स्मोकिंग से दूरी बना ली है। इनमें से बीते 4 महीनों में स्मोकिंग छोड़ने वाले 41 फीसदी लोग इसका कारण कोरोनावायरस को बताते हैं। इसके अलावा यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) ने पाया कि 2007 में इसका सर्वे शुरू होने के बाद अगर दूसरे वर्षों से तुलना की जाए तो जून 2020 तक सबसे ज्यादा लोगों ने स्मोकिंग छोड़ी है।

क्या हैं जोखिम?
कई डॉक्टर्स का मानना है स्मोकिंग नहीं करने वाले लोगों के मुकाबले स्मोकर्स ज्यादा गंभीर लक्षणों के जोखिम में हैं। जो कोविड सिम्प्टम ट्रैकर ऐप के अनुसार, नॉन स्मोकर्स की तुलना में स्मोकिंग करने वालों में कोरोनावायरस संक्रमण के तीन मुख्य माने जाने वाले लक्षणों (बुखार, लगातार खांसी, सांस में तकलीफ) के बनने की आशंका 14 प्रतिशत ज्यादा थी।

स्मोकिंग छोड़ने के लिए अपना कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं
कई लोग स्मोकिंग छोड़ने से डरते हैं, क्योंकि वे पहले भी कोशिश कर चुके, लेकिन असफल रहे। उन्हें लगता है कि यह बहुत कठिन है, क्योंकि वे छोड़ने के बाद होने वाले लक्षणों से उबर नहीं पाएंगे। उन्हें लगता है कि उनके पास कोई सपोर्ट नहीं है या वे इसमें सफल हो ही नहीं सकते हैं।

कुछ तरीके जिनकी मदद से आप में स्मोकिंग छोड़ने के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करेंगे

पहले एक दिन के लिए सिगरेट छोड़ने की कोशिश करें। फिर इसे दो दिन तक करें और क्रम को इसी तरह चलने दें।

रोल मॉडल्स को फॉलो करें। अपने आसपास के उन लोगों को देखें, जिन्होंने हाल ही में स्मोकिंग बंद की है। देखें कि आप उनके कौनसे तरीकों और प्रतिक्रियाओं को अपना सकते हैं।

हर कोशिश को मानें कि आप सीख रहे हैं। हर बार आपको पता लगता है कि क्या काम नहीं कर रहा और आपको सफल होने के लिए क्या करना होगा। आपको यह पता होना चाहिए कि स्मोकर्स के लिए बार-बार स्मोकिंग छोड़ना आम बात है, लेकिन वे बाद में सफल होते हैं।

स्मोकिंग छोड़ने को लेकर अपने निगेटिव मूड को सुधारें। कई लोगों को स्मोकिंग छोड़ते वक्त डर, तनाव और चिंता होती है। अपने आसपास परिवार और दोस्तों के भरपूर सपोर्ट को साथ रखें। अच्छे भोजन, एक्सरसाइज और पूरी नींद की मदद से हेल्दी लाइफस्टाइल तैयार करें।

स्मोकिंग छोड़ने के लिए "क्विट प्लान" तैयार करें
अगर आपने स्मोकिंग छोड़ने का फैसला कर लिया है तो यह बहुत अच्छी बात है। इसके लिए एक क्विट प्लान तैयार करें। इस प्लान में आपका अगला कदम, सलाह और सपोर्ट करने वाली चीजें शामिल होंगी। हमेशा याद रखें कि आप सफल हो सकते हैं।

ऐसे बनाएं "क्विट प्लान"

एक तारीख तय करें: जितना जल्दी हो सके स्मोकिंग छोड़ने के लिए तारीख चुनें। स्मोकिंग छोड़ने के लिए खुद को थोड़ा वक्त देना आपको फोकस और मोटिवेट रहने में मदद करेगा। बर्थडे या कोई जरूरी दिन चुनना अच्छा रहेगा, लेकिन आपको किसी नियम को मानने की जरूरत नहीं है। आप आज से भी स्मोकिंग बंद कर सकते हैं।

परिवार, दोस्तों और साथ काम करने वालों को बताएं: अपने फैसले के बारे में उन लोगों को जरूर बताएं जो आपसे ज्यादा संपर्क में रहते हैं। उन लोगों से सपोर्ट करने के लिए कहें। इसके अलावा अगर कोई साथी स्मोक करता है तो उसे समझने के लिए कहें। उन्हें बताएं कि अगर आप आसपास हैं तो स्मोक न करें।

चुनौतियों के बारे में पहले ही जान लें: स्मोकिंग छोड़ना आसान नहीं है और अगर आपने फैसला किया है तो आप बहादुर हैं। इस दौरान आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहें और खासतौर से पहले हफ्ते की मुश्किलों के लिए।

आपने आसपास से तंबाकू प्रोडक्ट्स हटा दें: सबसे जरूरी है तंबाकू के संपर्क में कम से कम आना। अगर आपके आसपास तंबाकू की चीजें हैं तो उन्हें हटा दें। स्मोकिंग एरिया में जाने से बचें और अपने साथियों को आपके सामने स्मोक न करने के लिए कहें।

सिगरेट में शामिल होते हैं 7 हजार से ज्यादा जहरीले कैमिकल्स
स्मोकिंग से केवल स्वास्थ्य ही नहीं आपके आसपास रहने वाले लोग भी प्रभावित होते हैं। डब्ल्यूएचओ की "ए गाइड टू फॉर टोबैको यूजर्स टू क्विट" के अनुसार, तंबाकू अपने करीब आधे यूजर्स को मार देता है क्योंकि तंबाकू प्रोडक्ट्स बहुत ही जहरीली चीजों से तैयार किए जाते हैं। तंबाकू स्मोक में 7 हजार से ज्यादा कैमिकल्स होते हैं, जिसमें से कम से कम 250 को हानिकारक और कम से कम 69 को कैंसर का कारण माना जाता है।

स्मोकिंग से जुड़े कुछ फर्जी दावे
खासतौर से विकासशील देशों में कई स्मोकर्स तंबाकू स्मोकिंग के खतरों को नहीं समझते हैं। इसके पीछे का कारण कंपनियों के गुमराह करने वाला डाटा बताया जाता है। ये रहे स्मोकिंग से जुड़े कुछ फर्जी दावे।

कम टार वाली सिगरेट सुरक्षित हैं: सुरक्षित सिगरेट जैसी कोई चीज नहीं होती है। कम टार वाली सिगरेट भी दूसरी सिगरेट की तरह हानिकारक हो सकती है।

खुद तंबाकू रोल कर बनाई गई सिगरेट सुरक्षित हैं: इस तरह की सिगरेट में भी कई कैमिकल्स होते हैं। रिसर्च बताती हैं कि खुद तंबाकू रोल कर बनाई गई सिगरेट भी फैक्ट्री में बनी सिगरेट के बराबर या उससे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है। स्टडीज में पता चला है कि खुद तंबाकू रोल कर सिगरेट बनाने वाले लोग ऐसी सिगरेट तैयार करते हैं जो ज्यादा टार और निकोटीन बनाती हैं।

सिगरेट की संख्या कम कर देने से हेल्थ रिस्क कम हो जाएंगे: सिगरेट पीने का कोई भी सुरक्षित स्तर नहीं है। कुछ लोग सिगरेट की संख्या को कम कर स्मोकिंग हैबिट को सुरक्षित बनाने की कोशिश करते हैं। इनमें से कई लोगों को काफी मुश्किल होती हैं और वे वापस उतनी ही सिगरेट दोबारा शुरू कर देते हैं। हालांकि, सिगरेट की संख्या कम करना जोखिम को थोड़ा कम जरूर कर देता है, लेकिन लंबे फायदे के लिए इसे छोड़ना ही बेहतर है।

केवल बुजुर्ग ही स्मोकिंग से बीमार होते हैं: स्मोकिंग करने वाले सभी लोगों में बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। सभी उम्र के लोग फेफड़ों की क्षमता कम होना, खांसी, जल्दी थकान जैसी शॉर्ट टर्म परेशानियों से जूझते हैं। स्मोकिंग सूंघने और स्वाद लेने की ताकत को भी खत्म करती है।

हर साल 80 लाख जानें लेता है तंबाकू
तंबाकू के नुकसान को सभी लोग जानते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, तंबाकू की वजह से होने वाली बीमारियों जैसे कार्डिवैस्क्युलर डिसीज, फेफड़ों की परेशानी, कैंसर, डायबिटीज और हाइपरटेंशन से हर साल 80 लाग लोग अपनी जान गंवा देते हैं। स्मोकिंग से रेस्पिरेटरी इंफेक्शन्स, कैंसर, अंधापन, नपुंसकता, हार्ट अटैक जैसी कई बीमारियां होती हैं। इसके अलावा अगर प्रेग्नेंट महिला तंबाकू सेवन करती है तो इससे कम वजन वाले बच्चे के जन्म की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।

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